आशाराम की रिहाई के लिए जंतर मंतर दिल्ली में अनशन चल रहा है।
1 सितम्बर 2013 को एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के मामले में जोधपुर राजस्थान पुलिस ने गिरफ्तार किया था। तब से सलाखों के पीछे हैं आशाराम। आसूमल सिरुमलानी इनका मूलनाम है। इसके बाद गुजरात की दो बहनों ने भी आशाराम और इनके इनके पुत्र नारायण सांई पर बलात्कार का मामला दर्ज़ कराया।
15 अगस्त 2013 को पीड़िता को जोधपुर के फार्म हाउस में छिंदवाड़ा के गुरुकुल से लाया गया क्योंकि उसकी तबियत ठीक नहीं थी उसने उलटी और चक्कर आने की शिकायत की थी। एक धार्मिक अनुष्ठान के बहाने पीड़िता को जोधपुर लाया गया। पीड़िता ने घर जाकर अपने माता-पिता से शिकायत की। पीड़िता के माता-पिता भी आशाराम के भक्त रहे हैं। 19 अगस्त 2013 को पीड़िता के माता-पिता ने आशाराम से दिल्ली में मिलने की कोशिश की लेकिन उन्हें मिलने नहीं दिया गया। तब 20 अगस्त 2013 की रात को 2 बजे दिल्ली के कमलानगर थाने में आशाराम के विरद्ध यौन उत्पीड़न का पीड़िता की ओर से केस दर्ज़ कराया गया। नए कानून के तहत अब देशभर में कहीं भी केस दर्ज़ कराया जा सकता है जिसे सम्बंधित थाने को ट्रांसफर कर दिया जाता है। केस दिल्ली से जोधपुर राजस्थान ट्रांसफर किया गया और आशाराम की गिरफ्तारी की करवाई शुरू की गयी। आशाराम को बड़ी मुश्किल से गिरफ्त में लिया जा सका।
आशाराम को जमानत पर बाहर लाने के लिए वकील राम जेठमलानी और सुब्रमनियन स्वामी भी जी तोड़ कोशिश कर चुके है लेकिन जे जे एक्ट और पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज़ इस मुकदमे में आईपीसी की धाराएं 342 ,376 ,354 ए ,506 ,509 /34 ,23 ,26 लगायी गयी हैं। मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई है।
निर्भया काण्ड के बाद आये महिला यौन उत्पीड़न कानून के तहत पीड़िता के नाबालिग होने पर आरोपी को जमानत नहीं देने का प्रावधान लाया गया है इसीलिए आशाराम अब तक सलाखों के पीछे हैं। इनके वकीलों ने पीड़िता (जोकि 12 वीं कक्षा की 16 वर्षीय छात्रा थी घटना के वक्त ) को मानसिक रूप से विक्षिप्त और बालिग़ घोषित करने की भरपूर कोशिश की लेकिन गंभीर आरोपों और साक्ष्यों के चलते सारी होशियारी धरी की धरी रह गयी।
बच्चों के यौन शोषण के आरोप आशाराम पर पहले भी लगते रहे लेकिन पैसे की ताकत से उन्हें दबाया जाता रहा। अब आशाराम की चिकित्सीय जांच से स्पष्ट हुआ कि यह तो बच्चों का यौन शोषण करने वाली बीमारी पीडोफीलिया से ग्रस्त है।
हाल ही में सर्वोच्च न्यायलय ने आशाराम की जमानत अर्ज़ी खारिज करते हुए आर्थिक जुरमाना लगाकर एक और जांच का आदेश दिया है कि जेल में रहते हुए निजी तौर पर डायग्नोस्टिक जांचें कैसे की गयीं।
दिल्ली में जंतर मंतर पर बैठे आशाराम के भक्त अपने स्वामी को निर्दोष बताते हुए रिहाई की मांग पर धरने पर बैठे हैं। यहाँ कोई इन्हें तवज़्ज़ो नहीं देता। यह सब पैसे का खेल है जो लोगों को सीधे -सीधे समझ आता है। देशभर में आशाराम के 400 आश्रम हैं जिनसे हर साल 400 करोड़ रुपये इकट्ठे होते थे। अब क्या हाल है इन आश्रमों का। इस केस में अहम गवाहों को भी मार दिया गया। मामला बहुत गंभीर है।
ऐसे सफेदपोश लोग भेड़ की खाल में छुपे भेड़िये हैं जो भोली भाली जनता की गाढ़ी कमाई लूटने और अय्याशी करने के लिए क्या -क्या नीच हरकतें कर सकते हैं। फिलहाल कोर्ट के फैसले का इंतज़ार है।
1 सितम्बर 2013 को एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के मामले में जोधपुर राजस्थान पुलिस ने गिरफ्तार किया था। तब से सलाखों के पीछे हैं आशाराम। आसूमल सिरुमलानी इनका मूलनाम है। इसके बाद गुजरात की दो बहनों ने भी आशाराम और इनके इनके पुत्र नारायण सांई पर बलात्कार का मामला दर्ज़ कराया।
15 अगस्त 2013 को पीड़िता को जोधपुर के फार्म हाउस में छिंदवाड़ा के गुरुकुल से लाया गया क्योंकि उसकी तबियत ठीक नहीं थी उसने उलटी और चक्कर आने की शिकायत की थी। एक धार्मिक अनुष्ठान के बहाने पीड़िता को जोधपुर लाया गया। पीड़िता ने घर जाकर अपने माता-पिता से शिकायत की। पीड़िता के माता-पिता भी आशाराम के भक्त रहे हैं। 19 अगस्त 2013 को पीड़िता के माता-पिता ने आशाराम से दिल्ली में मिलने की कोशिश की लेकिन उन्हें मिलने नहीं दिया गया। तब 20 अगस्त 2013 की रात को 2 बजे दिल्ली के कमलानगर थाने में आशाराम के विरद्ध यौन उत्पीड़न का पीड़िता की ओर से केस दर्ज़ कराया गया। नए कानून के तहत अब देशभर में कहीं भी केस दर्ज़ कराया जा सकता है जिसे सम्बंधित थाने को ट्रांसफर कर दिया जाता है। केस दिल्ली से जोधपुर राजस्थान ट्रांसफर किया गया और आशाराम की गिरफ्तारी की करवाई शुरू की गयी। आशाराम को बड़ी मुश्किल से गिरफ्त में लिया जा सका।
आशाराम को जमानत पर बाहर लाने के लिए वकील राम जेठमलानी और सुब्रमनियन स्वामी भी जी तोड़ कोशिश कर चुके है लेकिन जे जे एक्ट और पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज़ इस मुकदमे में आईपीसी की धाराएं 342 ,376 ,354 ए ,506 ,509 /34 ,23 ,26 लगायी गयी हैं। मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई है।
निर्भया काण्ड के बाद आये महिला यौन उत्पीड़न कानून के तहत पीड़िता के नाबालिग होने पर आरोपी को जमानत नहीं देने का प्रावधान लाया गया है इसीलिए आशाराम अब तक सलाखों के पीछे हैं। इनके वकीलों ने पीड़िता (जोकि 12 वीं कक्षा की 16 वर्षीय छात्रा थी घटना के वक्त ) को मानसिक रूप से विक्षिप्त और बालिग़ घोषित करने की भरपूर कोशिश की लेकिन गंभीर आरोपों और साक्ष्यों के चलते सारी होशियारी धरी की धरी रह गयी।
बच्चों के यौन शोषण के आरोप आशाराम पर पहले भी लगते रहे लेकिन पैसे की ताकत से उन्हें दबाया जाता रहा। अब आशाराम की चिकित्सीय जांच से स्पष्ट हुआ कि यह तो बच्चों का यौन शोषण करने वाली बीमारी पीडोफीलिया से ग्रस्त है।
हाल ही में सर्वोच्च न्यायलय ने आशाराम की जमानत अर्ज़ी खारिज करते हुए आर्थिक जुरमाना लगाकर एक और जांच का आदेश दिया है कि जेल में रहते हुए निजी तौर पर डायग्नोस्टिक जांचें कैसे की गयीं।
दिल्ली में जंतर मंतर पर बैठे आशाराम के भक्त अपने स्वामी को निर्दोष बताते हुए रिहाई की मांग पर धरने पर बैठे हैं। यहाँ कोई इन्हें तवज़्ज़ो नहीं देता। यह सब पैसे का खेल है जो लोगों को सीधे -सीधे समझ आता है। देशभर में आशाराम के 400 आश्रम हैं जिनसे हर साल 400 करोड़ रुपये इकट्ठे होते थे। अब क्या हाल है इन आश्रमों का। इस केस में अहम गवाहों को भी मार दिया गया। मामला बहुत गंभीर है।
ऐसे सफेदपोश लोग भेड़ की खाल में छुपे भेड़िये हैं जो भोली भाली जनता की गाढ़ी कमाई लूटने और अय्याशी करने के लिए क्या -क्या नीच हरकतें कर सकते हैं। फिलहाल कोर्ट के फैसले का इंतज़ार है।








